Sunday, May 17, 2009

सोचना मना है

सोचना मना है
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बडे बडे बुध्दिजिवियों ने
बहुत सोच समझ कर
कहा है कि
सोचना मना है !



इस लालच और
दुःखों भरी दुनिया में
खुश रहना हो तो
सोचना मना है !



एक 'पवन' का झोका
आया और बोला तू
बस लिखता चला जा
ऐ कवि, कुछ ना सोच
क्योंकि सोचना मना है !



दिमाग से चलती
इस दुनिया में
अगर दिल को
जगह दिलाना है,
तो सोचना मना है !



गमों के सायों को
खुशियों का आवरण
पहनाना है तो
सोचना मना है !



उठो ! तुम भी लिखो
जो मन करे वो करो
क्योंकि खुश रहने के लिये
सोचना मना है !



आप भी पढो इस कविता को
और जो आये दिल में
वो ही बोलना,
बिल्कुल ना सोचना
क्योंकि सोचना मना है !



कविता की हो तारीफ
या हो फिर निंदा,
इसका नही है कोई गम
क्योंकि दोस्तों !
सोचना मना है !



मैं लेखनी के इशारों पे
चलता गया
और 'अमित' ये
'किरन' रचना
रचता चला गया
ये ना पूछना यारों क्यों
क्योंकि सोचना मना है !!


अमित कुमार सिंह

Sunday, April 05, 2009

बाक्सिंग डे



बाक्सिंग डे

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घर में चहल पहल थी

बडे जोर शोर से

तैयारी चल रही थी

सभी कार्यक्रम स्थगित थे

सारी खरीदारी रुकी हुयी थी

आखिरकार दो दिन बाद

बाक्सिंग डे की

सेल जो थी !

सच ही है

इंसान चाहे हो हिन्दुस्तान का

या फिर हो अमरीका, कनाडा

या इंग्लिस्तान का,

मुफ्त का आकर्षण उसके

दिल को गुदगुदा जाता है,

एक के साथ एक मुफ्त का

विज्ञापन उसे लुभा ही जाता है !


देख ये हलचल टोरंटो शहर में

खिल उठा मेरा मन समंदर,

क्या ही बात है

कनाडा और हिन्दुस्तान में

रहा न अब कोई अन्तर !


साल भर से इस दिन का

इन्तजार करते लोगों के

चेहरे चमक रहे थे,

और मनपसंद वस्तु

मनचाहे दाम पर

खरीदने के लिये वो

व्याकुल हो रहे थे !




सुना था दुकानें

प्रातः पाँच बजे ही

खुल जाती हैं,

कतारें तो पूर्व संध्या पर

ही लग जातीं हैं,

कहीं मनपसंद वस्तु

हाथ से न निकल जाये,

इसलिये जनता दुकानों के

सामने ही सो जाती है !


बडे इन्तजार के बाद

आखिरकार वो दिन आ ही गया,

उत्सुकता के बादलों ने

मेरी आँखो में घेरा डाल दिया !


उस दिन कडाके की ठण्ड थी

टोपी मफलर से मैं भी

लिपटा हुआ था,

चार बजे की ब्रह्मबेला में

मै भी दुकान पर पहुँचा था,

दो सौ लोग मेरे आगे थे

और मैं समय से पीछे था !


उम्मीद की 'किरन'

होने लगी कमजोर,

तभी हुआ दुकान

खुलने का शोर,

लगा कि इतने लोगों के

बाद मैं क्या पाउँगा,

शायद इस बार कैमरे की

जगहउसका कवर ही पा पाउँगा,

और कैमरा शायद

अगले बरस ही ले पाउँगा !


तभी विचारों कि

इस आँधी पर लगा विराम,

देख लोगों की अटूट

'मुफ्त' निष्ठा को

'छूट' के प्रति इस

दैविय समर्पण को,

'अमित' दिल मेरा

भर आया,

और कनेडियनों के इस

पवित्र निशच्छल प्रेम को देख,

मैं भाव विभोर हो

कतार से बाहर आ गया !!



अमित कुमार सिंह

Monday, March 02, 2009

और मैनें लाटरी टिकट खरीदा

और मैनें लाटरी टिकट खरीदा

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नित्य प्रतिदिन बनते

देख लोगों को लखपति,

टोरंटो शहर की लाटँरी "लोटो"

मुझे भा गयी

अपनी सोई किस्मत को

जगाने के लिये मैने भी

कुछ डालँरों की

कुर्बानी दे ही डाली !


लाटरी खरीदते ही

हम तो जनाब

डगमगाने लगे,

अपने कदमों को

जमीन की जगह

हवा में पाने लगे !


लाटरी की महिमा

आँखो में छाने लगे,

लखपति बनने के सपने

पलक झपकते ही आने लगे !


कल्पनाओं के सितारे

तुरंत ही झिलमिलाने लगे,

और लखपतिओं वाले

स्वप्न दिखाने लगे !


सपनों के महल शीघ्र ही

खडे होने लगे,

और हम यूँ ही

डालँर लूटाने लगे !


लखपति बनने की

तैयारी करने लगे,

और घर आँगन को

हम सवाँरने लगे !


शनिवार को निकलेगा

परिणाम ये सोच,

बजरंगबली और शनिदेव

दोनों को मनाने लगे

और हम अब रोज शाम

मंदिर जाने लगे !


ख्यालों - खवाबों मे हम

डूबकी लगाने लगे,

आफिस में इस्तीफे के

सपने भी आने लगे !


गाडी के माडाँल भी

पसंद करने लगे,

फार्महाउस तो हम

सपनों मे ही खरीदने लगे !


हम लखपतिओं वाली

अदा भी दिखाने लगे,

और अपने को खानदानी

रईस बताने लगे !


हम लाटरी निकलने का

इन्तजार करने लगे,

कल्पनाओं को हकीकत में

बदलते देखने लगे !


आज तो है प्रभु का दिन

नंबर भी डाले थे

छ: के छ: अपने प्यारे,

फिर काहे नही आयेंगे

सितारे साथ हमारे,


अब तो महज दोस्तों

औपचारिकता ही है बाकी,

लखपति 'अमित' तो

आपके सामने ही खडा है,


आखिर एक पल की

नींद ही तो आनी रह

गयी है बाकी !!


अमित कुमार सिंह

Sunday, December 21, 2008

दीवाने सनम


दीवाने सनम

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बार बार घडी देख कर

बहाने ना बनाओ,

घूमने नहीं चलना है

तो यू न मुझे बनाओ !



हैलो - हैलो मिस्टर तुम यू

न मुझे सपने दिखाओ,

शापिंग करने चलते

हो तो बताओ !


यू ना आने वाली तेरी

मीठी -मीठी बातों मे सनम,

गहनें दिलाते हो तो

अपनी बातें सुनाओ !


आँखों मे बसे हो की

धुन न मुझे सुनाओ,

फोटो खिंचने के लिये

कैमरा तो पहले दिलाओ !


अरे ओ दिवाने सनम

दिल में रहने की बातें कर,

समय ना बिताओ

मेरे रहने के लिये पहले
घर तो एक बनाओ !


तुम दिवानों की बातें हैं

बडी ही निराली,

जेब है खाली और

अदा है शहंशाहों वाली !


सपने तो सनम तेरे

होते हैं बडे सुहावने,

कडी जिन्दगी की सच्चाई

पर सुने ना कोई बहाने !


बातें सुन ये मेरी

स्वार्थी न समझना,

हकीकत बता रही हूँ जिन्दगी की

गलत ना समझना !


बहुत हो गये गिले - शिकवे

बहुत हो गयीं 'किरन' शिकायतें,

अब तो मुझे बस यही है कहना

चाहे जो भी हो मुझे तो बस

'अमित' तेरे संग ही है रहना !!



अमित कुमार सिंह



Tuesday, December 09, 2008

उनकी याद

उनकी याद

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आती है याद उनकी,

दिल को बहुत सताती है

याद उनकी,

नाश्ते में खाता हूँ जब सैंडविच,

पकौडों की याद आती है बहुत!

दोपहर में जब खाता हूँ,

पिज्जा या बर्गर,

दाल रोटी की

याद आती है बहुत !

रात के खाने में देख नूड्ल्स

याद आती है,

बांसमती चावल कि

वो भीनी सुगन्ध !

मन हो जाता है

व्याकुल,

याद आते हैं जब वो दिन,

आधुनिकता कि दौड में,

जब लगते थे पकौडे पिछडे,

दाल रोटी कि

उडाते थे हँसी,

और बांसमती को

ठुकराते थे हम कभी !


श्रीमती जी करतीं थीं जब

भोजन करने का "किरन" आग्रह,

देते थे तब उन्हे ताने,

पिज्जा या बर्गर क्यों

नहीं आता तुम्हे बनाने!



लहसुन धनिये कि वो चटनी

सरसो का वो साग,

दिल को गुदगुदा जाती है

आज भी वो तडके वाली

चने की दाल!

उन गलतियों का
करता हूँ अहसास,
परदेशी शहर 'टोरंटो' में
जब आती है,
स्वदेशी खाने की "अमित" याद!!


- अमित कुमार सिंह

Saturday, April 19, 2008

इस्त्री और सौन्दर्य

इस्त्री और सौन्दर्य
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एक दिन मैं और
श्रीमती जी ब्यूटी पार्लर गये,
देख वहा इस्त्री मशीन
जगा मन मे कौतुहल,
पूछ बैठा सौन्दर्यबाला से-


क्या आप के यहा
इस्त्री भी होती है?
सुन ये सवाल वो
मुझे घूरने लगी
और सौन्दर्य के
मेरे अल्प ज्ञान पर
मुस्कराने लगी !


क्षण भर बाद वो बोली-
लगता है आप सौन्दर्य
की विधाओं से अंजान हैं
मेरे यहाँ पहली बार
बने मेहमान हैं !


मेरी इस बेवकूफी भरी
हरकत पर श्रीमती जी
उबलने लगीं,
और अपनी बडी-बडी आखोँ
से मुझे डराने लगीं !


पढ उनकी आखोँ का
ये सदेंश मुझे
अपना हश्र नजर
आने लगा और
अब बेलन वाले प्रसाद का
भय मुझे सताने लगा !


कुछ समय बाद
देखता हूँ कि-
इस्त्री गर्म हो
श्रीमती जी के बालों
पर चलने लगी है
और अपनी तपन से
उसे सीधा करने लगी है !


आधुनिक युग के
इस अदभुत दृश्य को
देखकर मेरी आँखें
खुली की खुली रह
गयीं और सौन्दर्य के
इस भौगोलीकरण पर,
उपकरणों के इस अनूठे
उपयोग पर,
मेरी 'अमित' लेखनी
स्तब्ध रह गयी !!


अमित कुमार सिंह

Tuesday, April 15, 2008

क़ैसे करु वर्णन ?

क़ैसे करु वर्णन ?
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लेखनी हुयी परेशान
कैसे लिखूँ उनका नाम,
उनके हसीन चेहरे पर
छायी मधुर 'किरन' का
कैस करु वर्णन,
सोचते -सोचते हो गयी
लेखनी भी बेचैन,
और लो ये तो
हो गयी सुबह से शाम !


सूर्य के प्रकाश से
प्रज्जवलित मुख का
वर्णन भी न कर पाया
और चांदनी ने अपनी
आभा उन पर,
बिखेर डाला !


आज कवि के
शब्दों ने मौन
क्यों है किया धारण?
नहीं है ये
बात साधारण !



कहना तो बहुत
कुछ चाहता हूँ,
पर शब्दों का
चयन नहीं कर
पा रहा हूँ !


चंचल हैं उनके
चितवन,
कटार सी तीखीं
हैं निगाहें,
अधरों पर छायी
मधुर मुस्कान है,
गुलाबी उनके
कपोल हैं,
चेहरा उनका,
चन्द्रमा सा गोल है,
उस पर जो कातिल
तिल है,
देख उसे होता
उद्देलित मेरा
दिल है !



सोच जिसे,
पुलकित हुआ मेरा मन है,
बाहें फैलाये,
खुशियां समेटने को
बेचैन ये दिल है !


श्यामल घटाओं सी
रेशमी जुल्फें हैं,
जिन पर अरुणिमा सा
चमकता सिन्दूर है,
करता चित्त की
वासनाओं जो दूर है,
क्या गजब का
चेहरे पर उनके
छाया नूर है !


पायलों का संगीत
उनके आने की
देता आहट है,
जल प्रपात सी
स्वच्छंद उनकी
खिलखिलाहट है,
क्या ही सुन्दर उनके
चेहरे की बनावट है !


मदमस्त उनकी चाल
उस पर उनकी
मतवाली अदा,
लेती है दिलों को हर,
देख ले कोई उन्हे
अगर सिर्फ पल भर !

उनके सौन्दर्य का
यदि करने लगे ये
आशिक 'अमित' वर्णन,
तो दोस्तों-

चाहिये अम्बर भर कागज,
समुन्दर दी स्याही,
पेडों की बना लूं
गर लेखनी,

तो फिर शायद प्रस्तुत कर पाये
ये प्रेमी कवि,
उनके मोहनी मूरत
और उस पर छायी
अव्दितीय आभा की
कुछ मधुर झलकियां !!



अमित कुमार सिंह

Sunday, January 06, 2008

प्रेम का रंग

प्रेम का रंग
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जब से देखा है

वो चेहरा,

चित्त हुआ उद्देलित,

बानी पर रहा न

नियन्त्रण,

लेखनी भी हुयी

बेकाबू,

अरे ये क्या हुआ

आपको रमेश बाबू ?


पता चला कि

रमेश बाबू की

अभी अभी हुयी है

सगाई,

और इन्होने उस

रामणी से आँख

है मिलाई


रमणी की वक्र

द्रिष्टि ने,

अपने रमेश बाबू कि

नींद है उडाई


अब बावरे से हुये

घूम रहे हैं,

खुशियों से देखो

कैसे झूम रहे हैं


आफिस के सहयोगी

कानाफूसी करने लगे हैं,

रमेश बाबू आजकल

काम जो करने लगे हैं


दोस्तों-मित्रों ने भी

बनाया उनका मजाक है,

बोले दीवानों का

होता यही हाल है


ये सज्जन जो-

बाल काढना अपना

अपमान समझते थे,

कपडों को साफ करना,

एक लज्जाजनक कृत,

आजकल बालों में

तेल डालकर

चकाचक कपडे पहने

इत्रमान हो बतियाते हैं,

और सबको सफाई कि

महत्ता समझाते हैं


कवि लोग भी हुये

हैरान-परेशान,

देख रमेश बाबू

का ये हाल परिवर्तन-

बिरादरी के लोगों की

संख्या अब घटने लगी है,

इसका करने लगे वो

आत्ममंथन


मंथन के इस दौर में,

अचानक आया,

मुझे भी ये ख्याल-

सुधर सकते हैं अगर

रमेश बाबू भी तो,

क्यूँ न मिला लूँ

मैं भी उनकी ही ताल मे ताल


कुछ दिनों बाद,

कवि बिरादरी में

एक और चर्चा

गुंजायमान हो उठी,

बिरादरी का एक और

'अमित' रंग

'क़िरन' की आँच में तपकर,

छोड गया था,

कवियों का संग


ऐसा ही होता है मित्रों -

छूट जाती है सारी

पुरानी तरंग,

जब चढता है,

प्रेम का दीवाना

और मधुर रंग


अमित कुमार सिंह

Friday, September 28, 2007

आलसी सच

आलसी सच
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आलस ने जब जोर मारा,
शरीर ने ली अंगडाई,
रोम रोम में भर गई ताजगी,
फुर्ती है चँहु ओर छाई,


कितनी भोली मासुमियत लेकर,
आलस है भाई 'अमित' देखो आई



मधुर रागिनी फैलाकर
आलस ये बोली-
नाहक ही मैं बदनाम हूँ,
जबकि करती कितने काम हूँ



कर शरीर की सारी क्रियाये सिथिल
देती उसे आराम हूँ ,
पर देखो मैं
फिर भी बदनाम हूँ,


मिलती हैं मुझे गालियाँ,
जबकि नही है इसमें
मेरी कोई खामियाँ



मुझ पर हो रहे हैं
चारो तरफ से प्रहार,
वो भी एक नही
अनेकों बार



अपनी असफ़लता का,
मुझ पर कर दोषारोपण,
कर रहें लोग
मेरा भी शोषण



अपना काम मेहनत से
करने की सजा पा रही हूँ ,
और इस कलयुग में
परोपकार करने का पाप
आलस पूर्वक कर रही हूँ



आलस पर लिखते लिखते
मेरी लेखनी भी थक गई ,
और मेरी आलसी कल्पना
निद्रा की गोद में सो गई



दूसरो की तरह मैंने भी
इसका श्रेय आलस को दिया ,
और इस कविता की
सत्यता को परखने के लिये,
'अमित' सपनों कि
दुनिया में खो गया



अमित कुमार सिंह

Tuesday, September 11, 2007

कौन है बूढ़ा


कौन है बूढ़ा
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जीवन के सब रंग
देख चुका,
बैठा हूँ
उम्र के आखिरी
पड़ाव पर!


ढ़ल चुकीहै काया
अपनों के बीच
में ही हो
गया हूँ पराया।


सेवा निवृत्ति के बाद
अचानक सा
सब बदल गया
घिरा रहने वाला
भीड़ों से
दिख रहा है आज
बिल्कुल अकेला।


वही है तन,
वही है काया
पल भर में ही
खुद को मैंने
उपेक्षित क्यों है पाया।


जटिल है स्थिति ये
समाधान की है
सिर्फ आस।


गूँज रहा है
प्रश्न ये,
मन में मेरे बार-बार,
क्षण भर पहले
भरा रहने वाला
अनंत ऊर्जा से
हो गया हूँ
क्या मैं अब ऊर्जाहीन,
बूढ़ा, लाचार
और बेकार?


पर आज के युवाओं
में फैले इच्छा शक्ति
की थकान और
वैचारिक शिथिलता को
देखकर सोचता हूँ-

कैसा है समाज
ये रूढ़ा,
कहना किसे चाहिए
और कह किसे
रहा है बूढ़ा।


अमित कुमार सिंह

Saturday, May 26, 2007

अफवाह-एक सच

अफवाह-एक सच
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अफवाहों पे ध्यान दो
है बडे काम की चीज
बिन पैसे खर्चे
फैलाये खबर सबके बीच


अफवाहों पर
करो भरोसा,
हमेशा समझो
इसे सच


सुन इसे करो
अपनी मनमानी
क्या सही, क्या गलत?
ये सोचना होगी
बिल्कुल नादानी


पूरा करो
इसका उद्देश्य,
भले बिखरे इससे
सारा देश-वेश


आओ मिल कर
करें तोड-फोड और
जम कर फैलायें हिंसा,
आखिर यही तो
हम चाहते हैं,
अफवाहों को
सच जो मानते हैं


लेकिन आज अगर हम
इन पर ध्यान देंगे,
तो कल देशद्रोहियों को
मौका मिल जायेगा,
वो तो अपना काम कर
निकल जायेंगे,
और हम बाद में
केवल पछताते
ही रह जायेंगे


ये नहीं है एक
'अमित' अफवाह,
इसे सच तुम मानो
और अफवाहों को
अफवाह के रुप में
ही तुम जानो


सदा अफवाहों को
एक कान से होकर
दूजे से निकल जाने दो,
बात ये मेरी अब
दोस्तों तुम मानों



अमित कुमार सिंह


Saturday, May 19, 2007

मोबाइल - हम कितने मजबूर

मोबाइल - हम कितने मजबूर
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मोबाइल पर घंटी बजी
नाम ना हुआ दर्शित,
परेश जी ने सोचा
कौन होगा और
जाने क्या चाहता होगा


अनमने भाव से
उठाया फोन
बोला हैलो कौन ?
उधर से आइ एक आवाज-
मैं हूँ बेटा !

सुन ये परेश जी
गये भडक और रंग
मेट्रो के रंग मे बोले-
अरे जान न पहचान,
कहते हो मुझे बेटा,
अरे बोलो अपना नाम
और बताओ क्या है काम


उधर से आई एक
हताशा से भरी आवाज,
मैं हूँ मि. दिनेश,
पहचाना या कुछ
और बताउँ ?

'दिनेश'! कौन हो भाई ?
काहे को मेरे अवकाश
का दिन करते हो बरबाद,
कुछ काम हो तो
बोलो वरना फोन रख
चलते बनो


मोबाइल पर फिर
उभरी वही निराशा से
भरी आवाज,
अब क्या बोलूँ बेटा,
प्रगति की इस दौड में
रिश्ते नाते हो गयें
हैं कमजोर,

इस मोबाइल युग में
लोग गयें है अपनों
कि पुकार भूल,
हो गयें है वो
न जाने कितने दूर


मोबाइल पर प्रदर्शित
नबंरों से होती है
अब अपनों कि पहचान,
अरे वो नासमझ इंसान !
जिसे नही रहा है
आज तू पहचान और
राग रहा है अपनी ही अलाप
वो है तेरा ही अभागा
बाप


सुन ये 'परेश' जी
रह गये सन्न,
मानो पड गय हो
रंग मे भंग


जाने क्या होता जा रहा है
आज की इस पीढी को,
सुविधाओं से लैस है
और दिल मे है गरुर,
पर मोबाइल मे दर्ज
नंबरो के आगे हैं वो
कितने मजबूर हैं
अपनों से हैं कितने दूर


अमित कुमार सिंह

Friday, May 11, 2007

मैंने हवा से कहा

मैंने हवा से कहा
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सुबह हो रही है
मैंने हवा से कहा।
हवा बह रही है,
मैंने जहाँ से कहा॥


सुबह की बेला आयी,
फिर भी तू सो रहा है।
रे मनुष्य! उठ जा,
ये हवा ने मुझसे कहा॥


मैंने हवा से कहा,
दुनिया सो रही है।
फिर तू क्योंबह रही है।

जवाब है हवा का,
नादान है तू,
नहीं हूँ मैं मनुष्य।
नि:स्वार्थ भाव से
बहते जाना
रुकना न ये काम
है हमारा॥


समुद्र के सीने को
चीर कर,चट्टानों से
टकरा कर भी
बहते जाना,बस बहते जाना
ही काम है मेरा।

समझ सको अगर तुम
ये संदेश मेरा
तो जहाँ में हो
जाये सबेरा।

तब हवा ये कहेगी
सुबह हो चुकी है,
हवा बह रही है
मनुष्य चल रहा है।

मनुष्य और हवा का
ये संगम होगा
कितना प्यारा,
खिल उठेगा जब
इससे संसार हमारा॥


हवा ने दिया संदेश
मानव को मिला ये उपदेश
कर्म-पथ पर बढ़ते जाना
सुबह हो या शाम।

बाधाओं से न तुम
घबराना,हवा की तरह
बस तुम चलते जाना।

पूरे होंगे सपने तुम्हारे
जग में फैलेगा नाम तेरा,
रुकना न तुम,बस बहते जाना,
हवा से तुम
बातें करते जाना।

रुक-रुक कर लेना
तुम आराम
ये भी आएगा तुम्हारे काम,
हवा तो सिर्फ हवा है,
सिर्फ उड़ते मत जाना।

पैर हों तुम्हारे जमीन पर,
सोच हो तुम्हारी
आकाश पर,
मान लो ये संदेश हमारा,
फिर होगा संगम
हमारा और तुम्हारा।

मुझसे ये हवा ने कहा,
मैं चुपचाप सुनता रहा।
कहने का तो है बहुत
कुछ पर,अब तू जा,
सुबह हो रही है,
मैंने हवा से कहा।

अमित‌ कुमार‌ सिह्

Monday, May 07, 2007

नारी समानता - एक परिवर्तन

नारी समानता - एक परिवर्तन
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नारी समानता के
इस युग में
भोजन पका रहा हूँ,
दफ्तर से लौटी
बीबी के लिये
चाय बना रहा हूँ


नारी जागरण कीं
क्रन्ति का शिकार हूँ,
कपडे धुलता-धुलता
हुआ अब मैं बेहाल हूँ


याद कर बीते दिनो को
सिसकता हूँ,
नारीयों के इस
नये कदम
से सिहर जाता हूँ


कहीं कोई गलती
ना हो जाये
इससे बचता हूँ,
नारी उत्पीडन का
केस कर दूँगी,
इस धमकी से
बहुत डरता हूँ


चारो ओर नारी-उत्थान
की चर्चा सुनता हूँ,
और अखबारों में अब
'घरेलू पति चाहिये'
का इश्तहार देखता हूँ


वो भी क्या दिन थे
आदेश जब हम
दिया करते थे,
चाय-पकौडों में
देरी होने पर
कितनी जोर से
गरजा करते थे


नारी शक्ति के
इस युग में
अब पुरुष-उत्पीडन का
केस लडता हूँ,
कटघरे में खडे
पुरुषों की सहमी हुयी
हालत को
बेबश देखता हूँ


क्या सही है
क्या गलत,
अभी कुछ नही
समझ आता है,

अब तो नारीयों से
यही है विनती-
भूल कर पुरानी बातों को

यदि वो बाँट लें
अब काम आधा-आधा,
तो होगा जीवन में
दोनों के सकून
ये है हमारा वादा


अमित कुमार सिंह

Sunday, May 06, 2007

धूम्रपान - एक कठिन काम

धूम्रपान - एक कठिन काम
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करते हैं जो धूम्रपान
की निन्दा
उनसे हूँ मै
बहुत खफा,

जान लें वो
इस कार्य कि
महत्ता को,
या फिर हो
जायें यहाँ से दफा


महान ये काम है
आसान नही ये राह है
वर्षो की साधना का
निकला ये परिणाम है


धुँयें के छल्ले बनाना
एक साँस में ही
पूरी सिगरेट पीना,
जहरीले धुँयें को
अपनें अन्दर समा कर
चेहरे पर खुशी की
झलक दिखलाना,
इसका नहीं कोई मेल है
ना ही ये हँसी और खेल है


खुद के फेफडों को
दाँव पर लगाकर
सिगरेट के कश
लगाते है
यूँ ही नहीं दुनियाँ में
साहसी हम कहलाते है


सिगरेट के धुँयें कितनों को
रोजगार दिलाते हैं,
इसकी एक कश से
कठिन से कठिन समस्या का
हल यूँ ही निकल आते हैं


बढती आबादी पर
लगाने का लगाम,
क्या नही कर रहे
हम नेक ये काम


खुद को धुँये में
जला कर
बनते हैं दुसरों के लिये
बुरे एक उदाहरण,
नहीं काम है ये साधारण


क्यूँ नाहक ही करते हो
हमे इस तरह बदनाम,
दे-दे कर गालियाँ
सुबह और शाम


अभी समझ आया या
फिर कुछ और सुनाउँ,
रूको! जरा पहले
एक सिगरेट तो जलाउँ


अमित कुमार सिंह

चेहरे पर चेहरा


चेहरे पर चेहरा
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मुखौटा पहन अपनी
पहचान छुपाये हुये है
आज का इंसान
चेहरे पर चेहरा
लगाये हुये है


समेट अपने अन्दर
दुःखों का समन्दर,
चेहरे पर हँसी
चिपकाये हुये है
आज का इंसान
चेहरे पर चेहरा
लगाये हुये है


वास्तविकता का
सामना करने से
घबराये हुये है,
आज का इंसान
चेहरे पर चेहरा
लगाये हुये है


चेहरे पर पडी
झुर्रियों को,
मेकअप में
छुपाये हुये है
आज का इंसान
चेहरे पर चेहरा
लगाये हुये है


जिसे समझा था दोस्त
निकला वो दुश्मन,
सच्चाई से कितनी दूरी
बनाये हुये है
आज का इंसान
चेहरे पर चेहरा
लगाये हुये है


हकीकत को भगा दूर
भ्रम में जीने की
आदत बनाये हुये है,
आज का इंसान
चेहरे पर चेहरा
लगाये हुये है


दिखावे के लोभ में

अपनों को ही
सताये हुये है,
आज का इंसान
चेहरे पर चेहरा
लगाये हुये है


खुद ही को
धोखा देकर,
खुश रहने के
सपने सजाये हुये है
आज का इंसान
चेहरे पर चेहरा
लगाये हुये है


चेहरे पर चिपके
इस चेहरे को देखकर
सोचता है 'किरन' ये मन-
क्यों कोमल संवेदनाओं
के मोल पर मशीनी,
हो रहा है इंसान ?

आधुनिकता की
इस दौड में,
अकेला ही तो
रह गया है वो,

जाने क्या चाहता है
आज का ये इंसान ?


अमित कुमार सिंह

Friday, April 27, 2007

मित्रता

मित्रता

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एक रिश्ता है ऐसा

बिल्कुल अनोखा हो जैसा,

स्वार्थ से अछूता,

समन्दर से गहरा हैं वो


जाति पाँति के बन्धनों से परे

धर्मों के आडम्बरों से दूर है जो

कहते हैं जिसे हम मित्रता,

क्या विश्वास है और

कितनी भरी है इसमें मधुरता


सुख मे भले ना

वो दिखलाये,

पर दुःख में हमेशा,

दोस्त काम आये


औपचारिकता से

परे है जो,

दिल के कितने करीब है वो


कह ना सके जो

बात किसी से,

दोस्तों से कह जाते हैं

कितनी सहजता से उसे


भरोसे का अटूट

आधार है जो,

मुसीबतों में खडा

चट्टान है वो


जिसकी देतें हैं

लोग मिसालें,

दोस्ती और दोस्त ही हैं

'अमित' मेरे यार,

जो हमारे जीवन रुपी

नाटक में

अदा करते हैं,

एक महत्वपूर्ण किरदार

वो भी दोस्तों!

एक नहीं अनेकों बार


अमित कुमार सिंह

Tuesday, April 24, 2007

नेता और नरक का द्वार

नेता और नरक का द्वार
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एक बार गलती से
नरक का द्वार
रह गया खुला,
सारे नेता भाग कर
स्वर्ग आने लगे,
स्वर्ग के पहरेदार
उनकी भीड को देख,
गश खाने लगे


जल्दी ही नेता
स्वर्ग में जनता
के शासन की
माँग उठाने लगे,
और इन्द्र की
कुर्सी हिलाने लगे


भोले स्वर्गवासी,
नेताओं की हाँ मे हाँ
मिलाने लगे,
और इन्द्र के सर पे
चिन्ता के बादल,
मडंराने लगे


समस्या का कैसे
निकालें समाधान,
इस पर वो
देवताओं से
बतियाने लगे


देख इन्द्र की हालत
नेता मुस्कुराने लगे,
और इन्द्र को
दावत पे बुलाने लगे


नेता,दावत में
समझौते का प्रस्ताव
पेश करने लगे,
और इन्द्र को माननें
के लिये दबाव,
डालने लगे


अन्त में कोई
रास्ता न देखकर
इन्द्र ने हाँ के लिये
गर्दन हिलायी,
और नेता लोग
एक-दूसरे को,
गले लगाने लगे


समझौते का रहस्य
जानने के लिये
लोग अकल लगाने लगे,
और नेता लोग
स्वर्ग छोड के,
जाने लगे


कविता खत्म
हो गयी,
और लोग उठ
के जाने लगे,

और क्या था -
समझौते का रहस्य ?
"जानने के लिये पढें
अगली किस्त",
के विज्ञापन
अन्तरजाँल पे
आने लगे


अमित कुमार सिंह

Monday, April 23, 2007

मै आवारा ही रह गया

मै आवारा ही रह गया
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बचपन में पढने
से ज्यादा,
खेलता ही रह गया,
और यूँ मै
आवारा ही रह गया


यौवनावस्था में

सामने रहने वाले,
चाँद के टुकडे को
देखता ही रह गया,
और यूँ मै
आवारा ही रह गया


बडे होने पर जब

कुछ कर गुजरने का
समय आया,
दोस्तों के साथ गप्पें
मारता ही रह गया,
और यूँ मै
आवारा ही रह गया


जब कोई रास्ता

नहीं बचा तो,
कलम-कागज लेकर
अपने अनुभव को
ही निचोडनें लगा,

और बातों ही बातों में
कवितायें करने लगा,
और यूँ मै
आवारा ही रह गया


अमित कुमार सिंह

Thursday, April 12, 2007

भूत

भूत
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कल्पना नही

हकिकत हूँ,
काया नहि
एक साया हूँ मै,
इंसानों ने किया

मुझे बदनाम,
दे दिया है
'भूत' मेरा नाम

करता हूँ कितना
मै काम,
निकल जाता हूँ
होते हि शाम

कहते हैं भूत को
होते हैं ये बुरे,
पर हिंसा,अत्याचार,
बेईमानी और भ्रष्टाचार
ये किसने हैं करे?

इंसानों ने अब
करना शुरु कर दिया
हम पर भी अत्याचार,
डराने का खुद ही करके
करने लगे हैं हमारे
पेटों पर वार

डरता हूँ अब इंसानो से
लेता हूँ अपना दिल थाम,
कहीं ये कर ना दें
मेरा भी काम तमाम

हम भूत ही सही
पर हमारा भी है
एक ईमान,
डराने के अपने काम पर
देते हैं हम पूरा ध्यान

हम ही हैं जो
कराते हैं लोगों को
इस कलियुग मे भी
ईश्वर का ध्यान,
क्या नहीं कर रहे
हम कार्य एक महान ?

अमित कुमार सिंह