Thursday, October 28, 2010

और सामूहिक

और सामूहिक
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ये शब्द सुनते ही

मन में कौंध उठती है,

किसी अबला की चीख,

किसी की करुण पुकार,

किसी की उजड़ती लाज,

किसी की हृदयविहारक रुदन,

किसी निरीह नारी की गिड़गिड़ाहट ,

दानवी चेहरों वाले

शैतानों की खिलखिलाहट,

मानवों का अमानवीय कर्म


पर क्या स्त्री की

लज्जाहरण का यह

दुष्कर्म इतना,

सुलभ और आम हो गया है

हमारे समाज में कि,

हमारा चिंत "सामुहिक"

शब्द सुनते ही

इसकी कल्पना

कर लेता है ?


अगर यह सच है,

तो सचमुच ही

हमारा समाज

पतन कि ओर

अग्रसर है,

और हम चरित्रहीनता

की ओर

सुनकर जब "सामुहिक "

शब्द,मन में कौंधे

श्रमदान, सेवा, प्रतिज्ञा,

और परोपकार

का कर्म,

तभी होगा हमारे

देश का कल्याण और

सार्थक होगा आदर्श

"अमित" समाज का मर्म


अमित कुमार सिंह

1 comment:

POOJA... said...

bahut hi pyaara vichaar... sahi kaha, saamuhik" shabd ka sadupyog hona chahiye jisse use sunne ke baad ghrina nahi balki suvichaar aane chahiye... atiuttam...