Friday, March 23, 2007

मटियावो ना..

मटियावो ना..
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मटियावो ना का
मंतरजब से है जाना,
भोलू जी के जीवन में
आया नया तराना

पहले लगे रहते थे
आफिस में देर तक,
करने में बासॅ को खुश
अब सोंचते हैं क्या फायदा,
चलो मटियावो ना
घर अब जल्दी जाओ ना

देख शोरुम में समानों को
जब जेब पर पडा जोर,
मटियावो ना के शोर ने
कर दिया भोलू जी
को भाव-विभोर

एक बार चल रहि थी
गरमा गरम बहस,
हो रहे थे बडे-बडे दावे,
पीछे हटने को कोई
न था तैयार,
उलझ गये थे
जब सारे तार,
तब भोलू जी ने
कि एक शुरुवात,
फिर प्रसन्न मन
लगाने लगे सभी,
मटियावो ना का
नारा बार बार

मंहगा टिकट लेकर
भोलू जी एक बार
गये मल्टिप्लेक्स में,
दिल में था बडा जोश,
मगर फिल्म नें किया बोर
हुआ उन्हे बडा अफसोस,
तब मटियवो ना कहकर
किया उन्होने सन्तोष

पढ कर जब ये कविता
पाठकों ने नही दिया
कोई टिप्पणी,
कवि के दिल में
हुयी 'अमित' बेचैनी,
आने लगा एक
'स्नेह' ख्याल,
चलो छोडों ना ...
अरे मटियावो ना ...

--अमित कुमार सिंह

2 comments:

अनूप शुक्ला said...

सही है। कोई टिप्पणी न करे तो परेशान होने की जगह कहो-मटियाऒ न!

संजय बेंगाणी said...

चलो छोडों ना ...
अरे मटियावो ना ...

:)