Tuesday, April 24, 2007

नेता और नरक का द्वार

नेता और नरक का द्वार
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एक बार गलती से
नरक का द्वार
रह गया खुला,
सारे नेता भाग कर
स्वर्ग आने लगे,
स्वर्ग के पहरेदार
उनकी भीड को देख,
गश खाने लगे


जल्दी ही नेता
स्वर्ग में जनता
के शासन की
माँग उठाने लगे,
और इन्द्र की
कुर्सी हिलाने लगे


भोले स्वर्गवासी,
नेताओं की हाँ मे हाँ
मिलाने लगे,
और इन्द्र के सर पे
चिन्ता के बादल,
मडंराने लगे


समस्या का कैसे
निकालें समाधान,
इस पर वो
देवताओं से
बतियाने लगे


देख इन्द्र की हालत
नेता मुस्कुराने लगे,
और इन्द्र को
दावत पे बुलाने लगे


नेता,दावत में
समझौते का प्रस्ताव
पेश करने लगे,
और इन्द्र को माननें
के लिये दबाव,
डालने लगे


अन्त में कोई
रास्ता न देखकर
इन्द्र ने हाँ के लिये
गर्दन हिलायी,
और नेता लोग
एक-दूसरे को,
गले लगाने लगे


समझौते का रहस्य
जानने के लिये
लोग अकल लगाने लगे,
और नेता लोग
स्वर्ग छोड के,
जाने लगे


कविता खत्म
हो गयी,
और लोग उठ
के जाने लगे,

और क्या था -
समझौते का रहस्य ?
"जानने के लिये पढें
अगली किस्त",
के विज्ञापन
अन्तरजाँल पे
आने लगे


अमित कुमार सिंह

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