Thursday, December 07, 2006

मैंने हवा से कहा

मैंने हवा से कहा

सुबह हो रही है
मैंने हवा से कहा।
हवा बह रही है,
मैंने जहाँ से कहा॥

सुबह की बेला आयी,
फिर भी तू सो रहा है।
रे मनुष्य! उठ जा,
ये हवा ने मुझसे कहा॥

मैंने हवा से कहा,
दुनिया सो रही है।
फिर तू क्यों
बह रही है।

जवाब है हवा का,
नादान है तू,
नहीं हूँ मैं मनुष्य।

नि:स्वार्थ भाव से
बहते जाना
रुकना न ये काम
है हमारा॥

समुद्र के सीने को
चीर कर,
चट्टानों से टकराकर भी
बहते जाना,
बस बहते जाना
ही काम है मेरा।

समझ सको अगर तुम
ये संदेश मेरा
तो जहाँ में हो
जाये सबेरा।

तब हवा ये कहेगी
सुबह हो चुकी है,
हवा बह रही है
मनुष्य चल रहा है।

मनुष्य और हवा का
ये संगम होगा
कितना प्यारा,
खिल उठेगा जब
इससे संसार हमारा॥

हवा ने दिया संदेश
मानव को मिला ये उपदेश
कर्म-पथ पर बढ़ते जाना
सुबह हो या शाम।

बाधाओं से न तुम
घबराना,
हवा की तरह
बस तुम चलते जाना।

पूरे होंगे सपने तुम्हारे
जग में फैलेगा नाम तेरा,
रुकना न तुम,
बस बहते जाना,
हवा से तुम
बातें करते जाना।

रुक-रुक कर लेना तुम आराम
ये भी आएगा तुम्हारे काम,
हवा तो सिर्फ हवा है,
सिर्फ उड़ते मत जाना।

पैर हों तुम्हारे जमीन पर,
सोच हो तुम्हारी
आकाश पर,
मान लो ये संदेश हमारा,
फिर होगा संगम
हमारा और तुम्हारा।

मुझसे ये हवा ने कहा,
मैं चुपचाप सुनता रहा।

कहने का तो है बहुत
कुछ पर,
अब तू जा,
सुबह हो रही है,
मैंने हवा से कहा।


अमित‌ कुमार‌ सिह्

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